– राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त अध्यक्ष को नहीं मिला कलेक्टर से समय, एसडीएम को भेजकर की रस्म अदा
– जिला पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि बोले कोई अधिकारी नहीं देता हैं समय, ना ही करते सुनवाई
रतलाम। कहते हैं कि सत्ता बदलती है, लेकिन सिस्टम नहीं, और सिस्टम को सही ढंग से चलाने का काम जिले के आला अधिकारियों का होता हैं, लेकिन जब इन्ही अधिकारियों के सिर पर अफसरशाही सिर चढ़कर बोलती हैं तो क्या जनता और क्या नेता … ? अफसरों को सभी एक जैसे ही दिखाई देते हैं। ऐसी ही एक तस्वीर सोमवार को साफ दिखाई दी, जब भाजपा समर्थित जिला पंचायत अध्यक्ष और राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त लालाबाई चंद्रवंशी को ही कलेक्टर से मिलने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा। घंटों इंतजार के बाद भी जब रतलाम कलेक्टर मिशासिंह ने उन्है समय नहीं दिया तो वे कलेक्टर आफीस के बाहर ही अपने पति के साथ धरने पर बैठ गई। यह घटना सिर्फ एक विरोध नहीं, बल्कि जिले में बढ़ती अफसरशाही के रवैये का खुला प्रदर्शन बन गई हैं, जहां अधिकारी खुद को जनप्रतिनिधियों और जनता दोनों से ऊपर समझने लगे हैं।
जनहित के मुद्दों को लेकर सुबह से कलेक्टर से मिलने का समय मांग रही जिला पंचायत अध्यक्ष लालाबाई चंद्रवंशी और उनके पति शंभूलाल चंद्रवंशी को जब लगातार नजरअंदाज किया गया, तो आखिरकार उन्हें कलेक्टर ऑफिस के गेट पर ही धरने पर बैठना पड़ा। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जिले की इतनी बड़ी जनप्रतिनिधि होने के बावजूद कलेक्टर ने उनसे मिलने की ज़हमत तक नहीं उठाई। मामला तब जाकर शांत हुआ जब कलेक्टर खुद नहीं आईं, बल्कि एसडीएम को भेजकर औपचारिकता निभाई गई। मामले में जिला पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि शंभुलाल का कहना है कि जिले के अधिकारी नहीं सुनते हैं, किसी भी काम के लिए समय मांगों तो उनके पास समय नहीं रहता हैं।
दूसरा मामला भी बना सवाल –
उल्लेखनीय है कि इससे पहले 17 मार्च को करणी सेना परिवार के प्रमुख जीवन सिंह शेरपुर भी अपनी 11 जनहित की मांगों को लेकर कलेक्टर से मिलने निकले थे। लेकिन हालात इतने बदतर रहे कि उन्हें कलेक्टर से मिलने के लिए रतलाम की सीमा पर दो दिन तक इंतजार करना पड़ा, फिर भी कलेक्टर ने मुलाकात नहीं की। दो दिन तक जीवनसिंह के आम जनता भी धुप में तपती रही, जीवनसिंह तंबु लगाकर रात भर डटे रहे, फिर भी कलेक्टर उनसे मिलने, आम जनता की समस्या सुनने नहीं पहुंची।
व्यवस्था पर बड़ा सवाल –
जिले में कई अधिकारी पहले से ही समय पर काम नहीं निपटाने के लिए चर्चाओं में हैं। ऐसे में जब जिले की मुखिया ही जनता और जनप्रतिनिधियों से दूरी बनाए रखें, तो बाकी सिस्टम से जवाबदेही की उम्मीद करना बेमानी लगता है। ऐसे में अब जिले भर के अधिकारियों से काम करवाने के लिए, अपनी सुनवाई करवाने के लिए केवल धरना और प्रदर्शन का ही सहारा रह गया हैं।
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