– रतलाम जिले की जावरा तहसील के ग्राम रिछाचांदा के 5 किसानों पर लगाया आर्थिक दण्ड
– सोश्यल मीडिया पर भी जमकर वायरल हो रहा आदेश
– किसान बोले सुविधा दो, समाधान दो, सिर्फ जुर्माना क्यों ?
जावरा/ रतलाम । कागज़ों में कृषक कल्याण वर्ष और मंचों से बड़े-बड़े वादे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। रतलाम जिले के जावरा क्षेत्र में पराली जलाने पर किसानों पर लगाए गए 25 हजार के अर्थदंड ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कल्याण किसका हो रहा है—किसानों का या सिर्फ आंकड़ों का ? रतलाम कलेक्टर के निर्देश पर जावरा तहसीलदार ने उक्त दण्डादेश जारी किया हैं। यह आदेश सोश्यल मीडिया पर भी जमकर वायरल हो रहा हैं। जिस पर सरकार को लेकर कई तीखे कमेट्स भी आ रहे हैं।
आदेश नहीं, किसानों पर सीधा प्रहार ! –
तहसील जावरा के ग्राम रिछाचांदा में प्रशासन ने पराली जलाने के मामले में जिला कलेक्टर मिशासिंह के आदेश पर जावरा तहसीलदार ने रिछाचांदा के 5 किसानों पर कार्रवाई करते हुए 5000-5000 रुपए का जुर्माना ठोक दिया। यह कार्रवाई पटवारी की रिपोर्ट के आधार पर की गई, लेकिन इससे किसानों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
भाषणों में कल्याण, जमीन पर दंड ! सरकार का दोहरा चरित्र –
प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और देश के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान मंचों से किसानों के हितों की बात करते नहीं थकते, लेकिन जमीनी स्तर पर बिना विकल्प दिए इस तरह की सख्ती किसानों के साथ अन्याय मानी जा रही है। रतलाम कलेक्टर के इस आदेश के बाद इस बात की चर्चा आम हो चुकी हैं कि सरकार और उसके मंत्री भाषणों में तो किसान कल्याण की बात करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों पर दण्ड आरोपित कर रहे हैं। ऐसे में रतलाम कलेक्टर का यह आदेश सरकार के दोहरे चरित्र को उजागर करता हैं।
मजबूरी को बनाया गया अपराध ? –
किसानों का कहना है कि पराली हटाने के लिए मशीनें उपलब्ध नहीं हैं, फसलो के उचित दाम नहीं मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति पहले से कमजोर हैं, समय पर अन्य विकल्प नहीं मिलता हैं। ऐसे में सवाल उठता हैं क्या मजबूरी में किया गया काम अब अपराध बन गया है ? जो सरकार सीधे दण्ड आरोपित करने पर उतारु हो चुकी हैं।
तुगलकी फरमान से भड़के किसान –
स्थानीय किसान और ग्रामीण इस कार्रवाई को तुगलकी आदेश बता रहे हैं। उनका साफ कहना हैं कि सुविधा दो, समाधान दो, सिर्फ जुर्माना क्यों ? पराली जलाना पर्यावरण के लिए हानिकारक जरूर है, लेकिन बिना वैकल्पिक व्यवस्था के सख्ती करना किसानों पर अतिरिक्त बोझ डालना माना जा रहा है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि पहले संसाधन, फिर प्रतिबंध ही सही रास्ता है।
अब बड़ा सवाल यह है –
इस मामले में अब बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है किं क्या कृषक कल्याण वर्ष में किसानों को राहत मिलेगी या ऐसे ही जुर्मानों का बोझ ? रतलाम का यह मामला सिर्फ एक कार्रवाई नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर सवाल है जो किसानों से सहयोग की जगह सीधे सजा देने में जुटा हुआ है।

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