– अमृत 2.0 योजना में 66 लाख का बड़ा खेल
– आधे-अधूरे काम का नपा ने ले लिया हैंडओवर, भुगतान भी कर दिया शुरु
जावरा। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी अमृत 2.0 योजना के तहत शहर को हरियाली और नागरिकों को मनोरंजन स्थल देने के उद्देश्य से बनाया गया मिनीपुरा स्थित मिर्ची मैदान का नया बगीचा अब खुद योजना की साख पर सवाल खड़े कर रहा है। करीब 66 लाख रुपए की लागत से तैयार इस बगीचे को दिसंबर 2025 तक पूर्ण कर नगर पालिका (नपा) को सौंपना था, लेकिन जो बगीचा नपा को हैंडओवर किया गया, वह किसी भी मायने में बगीचा दिखाई ही नहीं दे रहा। जो बगीचा नपा ने स्वीकार किया है, वह बगीचा कम और सरकारी पैसों के दुरुपयोग का जीता-जागता नमूना ज्यादा नजर आ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर यही बगीचा है, तो खाली मैदान इससे बेहतर था।
हरियाली के नाम पर धोखा, एक नीम का पेड़ ही पूरी योजना –
बगीचे की सबसे चौंकाने वाली सच्चाई यह है कि यहां हरियाली के नाम पर न लॉन बना, न फूलदार पौधे लगे, ना ही कोई फलदार पौधे ही लगाए गए, सुंदरता के लिए बगीचे में किसी प्रकार के कोई डेकोरेटिव प्लांटस ही लगाए गए हैं। पूरा परिसर घूमने पर केवल पहले से खड़ा एक पुराना नीम का पेड़ ही दिखाई देता है। जिस जगह बच्चों की किलकारियां गूंजनी थीं, वहां आज भी धूल, कचरा और सूना मैदान है। लाखों रुपए की योजना का परिणाम, एक पेड़ और चारदीवारी!

बाउंड्रीवॉल बनी, बाकी सब अधूरा –
बगीचे में केवल बाउंड्रीवॉल का निर्माण किया गया है। वह भी अब टूट-फूट का शिकार हो चुकी है। कई स्थानों से रैलिंग टूट गई, कुछ जगहों से रैलिंग गायब हो चुकी हैं, आसपास के रहवासियों ने इस मैदान में आने जाने के लिए अपनी सहुलियत के हिसाब से रेलिंग को तोड़ दिया। बांउड्रीवाल भी इतनी नीची बनी है कि कोई भी इस बगीचे के नाम पर पड़े मैदान में गेट के जगह किसी भी स्थान से प्रवेश कर सकता हैं।
पानी निकासी की नालियां कचरे और गाद से भरी –
बगीचे के रुप में स्थित यह मैदान गंदगी से पटा पड़ा हैं, दिसंबर में पूरा हुआ बताकर सौंपा गया यह बगीचा दो महीने भी टिक नहीं पाया और जर्जर होने लगा। पौधे लगाने के लिए जो क्यारियों के लिए जो जगह छोड़ी गई हैं, उसमें कचरा जमा हैं, बगीचे के कार्नर व बाउंड्रीवाल के हर कोना डस्टबीन बन गया हैं। चार दिवारी के बाहर भी नपा के सफाई कर्मचारियों ने अस्थायी ट्रेचिंग ग्रांउड बना रखा हैं।

शौचालय बदहाल, झूले गायब –
बच्चों के मनोरंजन के लिए यहां नाम मात्र के लिए तीन झूले और करीब चार चकरिया लगाई गई। लेकिन तीनों ही झुले के केवल स्टेण्ड ही मैदान में खड़े हैं, तीनों के ही झूले गायब हैं। वहीं जो चकरिया लगी हैं उनमे से भी एक या दो ही चालु हैं, बाकी टूट गई हैं। बगीचे में घुमने आने वाले लोगों के बैठने के लिए बनाई गई पत्थर की कुर्सियां भी टूट चुकी हैं। वहीं बगीचे में बना शौचालय उपयोग के लायक नहीं है। पैदल चलने के लिए जो ट्रेक बनाया गया हैं, उस पर लगे पैवर ब्लाक भी टूट चुके हैं, ऐसे में यह बगीचा, बगीचा ना होकर एक लावारिस मैदान बना हुआ हैं।

रात में शराबियों का अड्डा –
बच्चों के खेलने की जगह बनने वाला यह परिसर अब रात में शराबियों का अड्डा बन गया है। बगीचे का मेन गेट तो बना हैं, लेकिन कभी बंद नहीं होता हैं, इस बगीचे की देखरेख के लिए एक भी कर्मचारी नहीं हैं, इसके मेन गेट पर लगा साइन बोर्ड भी गायब हो चुका हैं। बगीचे में लाइट पोल तो लगे हैं, उनमे से कई टूट चुके हैं, कई पर लगी लाईटे बंद पड़ी हैं। परिसर में अंधेरा रहता हैं ऐसे में महिलाएं और बच्चे यहां आने से डरते हैं।
बगीचे में ही पड़ा निर्माण मटेरियल –
बगीचे के अंदर ही मिनीपुरा में बन रही नवीन पानी की टंकी का निर्माण सामग्री पड़ी है। नालियां गाद और कचरे से भरी हुई हैं। यानी बगीचा नहीं, खुला स्टोर रूम और कचरा स्थल बन गया है।

काम अधूरा, भुगतान पूरा शुरू –
66 लाख रुपए में बने इस बगीचे में सबसे गंभीर बात यह सामने आई है कि करीब 25 लाख रुपए का भुगतान ठेकेदार को कर दिया गया है, जबकि काम अधूरा है और सुविधाएं मौजूद नहीं हैं। अब बड़ा सवाल यह उठ रहा हैं कि क्या बिना भौतिक निरीक्षण के भुगतान हुआ ?
नपा पर उठ रहे सीधे सवाल –
प्रतिनिधि द्वारा जब बुधवार को इस बगीचे का भौतिक रुप से जाकर निरीक्षण किया गया तो यह सवाल सामने आए कि क्या किसी अधिकारी ने मौके पर निरीक्षण किया था ? अधूरे निर्माण के साथ हैंडओवर क्यों स्वीकार किया गया ? गुणवत्ता जांच हुई या केवल कागज़ों में प्रक्रिया पूरी हुई ? क्या कमीशनखोरी ने बगीचे को बनने से पहले ही खत्म कर दिया ? शहरवासियों का कहना है कि अगर 66 लाख में ऐसा बगीचा बनता है, तो आम नागरिक अपने घर के सामने इससे बेहतर पार्क खुद बना सकता है।

जांच और कार्रवाई की मांग –
स्थानीय नागरिकों ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच, तकनीकी परीक्षण और जिम्मेदार अधिकारियों व ठेकेदार पर कार्रवाई की मांग की है। लोगों का कहना है कि यह सिर्फ एक बगीचे का मामला नहीं, बल्कि जनता के टैक्स के पैसे की जवाबदेही का सवाल है। अमृत 2.0 योजना का उद्देश्य शहरों में हरियाली बढ़ाना था, लेकिन मिनीपुरा का यह बगीचा फिलहाल एक ही संदेश दे रहा हैं योजना आई, पैसा गया और बगीचा कागज़ों में ही रह गया।

