– हाईकोर्ट के एक आदेश से मध्यप्रदेश की नगर परिषदों में बढ़ी हलचल, बंद हो चुके कई मामलों के फिर खुलने की उम्मीद
– नागदा के अशोक मावर एवं अन्य और जावरा की रुकमन धाकड़ की अपीलों पर राहत, डिवीजन बेंच ने कहा— क्वो वारंटो याचिका केवल देरी के आधार पर खारिज नहीं की जा सकती; समान मामलों में बन सकता है अहम कानूनी आधार।
इंदौर/जावरा। मध्यप्रदेश की नगर परिषदों और नगर पालिकाओं में अध्यक्षों के चुनाव को लेकर चल रहे विवादों पर हाईकोर्ट का एक आदेश दूरगामी असर छोड़ सकता है। इंदौर खंडपीठ ने साफ कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति कथित रूप से बिना वैधानिक अधिकार के सार्वजनिक पद पर बैठा है, तो केवल वर्षों की देरी का हवाला देकर उसकी वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज नहीं की जा सकती। इस फैसले ने नागदा और जावरा से शुरू हुई कानूनी लड़ाई को प्रदेशव्यापी बहस का विषय बना दिया है। ऐसे में अब इस आदेश के बाद नगर परिषद अध्यक्ष के वित्तिय अधिकारों पुन: बहाल करने के आदेश निरस्त होंगे तथा पूर्व में वित्तिय अधिकारों पर रोक लगाने के आदेश पुन: बहाल हो जाएंगे।
रीट याचिकाएं पुन: हुई बहाल –
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने नगर निकायों के चुनाव से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्थापित करते हुए ऐसा आदेश पारित किया है, जिसके बाद प्रदेशभर में पहले देरी के आधार पर खारिज की गई समान प्रकृति की याचिकाओं पर नई चर्चा शुरू हो गई है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया एवं न्यायमूर्ति आनंद पाठक की डिवीजन बेंच ने Writ Appeal No. 1505/2026 (Ashok Mawar and Others Vs. State of Madhya Pradesh and Others), Writ Appeal No. 2725/2026 (Ashok Mawar and Others Vs. State of Madhya Pradesh and Others) तथा Writ Appeal No. 2726/2026 (Smt. Rukman Dhakad Vs. State of Madhya Pradesh and Others) में पारित आदेश के जरिए पहले खारिज की गई रिट याचिकाओं को पुनः बहाल कर दिया।
अध्यक्ष पद की आवश्यक अधिसूचना जारी नहीं होने से जुड़ा हैं मामला –
हाई कोर्ट के इस आदेश में ये अपीलें नागदा और जावरा नगर परिषद से जुड़े विवादों से संबंधित हैं। अपीलकर्ताओं का कहना था कि संबंधित अध्यक्षों के निर्वाचन के संबंध में मध्यप्रदेश नगरपालिकाएं अधिनियम, 1961 की धारा-45 के तहत आवश्यक अधिसूचना जारी नहीं की गई, जबकि वे अध्यक्ष पद पर कार्यरत हैं।
क्या कहा हाईकोर्ट ने ? –
डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि यदि कोई व्यक्ति बिना वैधानिक अधिकार के किसी सार्वजनिक पद पर कार्य कर रहा है, तो उसके विरुद्ध दायर क्वो वारंटो (Quo Warranto) याचिका को केवल Delay and Laches (देरी) के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि एकलपीठ द्वारा केवल देरी के आधार पर याचिकाओं को खारिज करना उचित नहीं था। इसी के साथ पहले समाप्त किया गया अंतरिम आदेश भी बहाल कर दिया गया और निर्देश दिया कि अब इन मामलों की सुनवाई मेरिट (तथ्यों एवं कानून) के आधार पर की जाए।
क्यों माना जा रहा है बड़ा फैसला ? –
प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान नगर परिषदों और नगर पालिकाओं के अध्यक्षों के निर्वाचन को लेकर कई याचिकाएं दायर हुई थीं। इनमें से कुछ याचिकाएं केवल देरी के आधार पर खारिज भी कर दी गईं। ऐसे में हाईकोर्ट का यह आदेश समान प्रकृति के मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी आधार बन सकता है। यदि अन्य मामलों के तथ्य भी समान हैं, तो संबंधित पक्ष इस आदेश का हवाला देते हुए अपनी कानूनी राहत की मांग कर सकते हैं।
जावरा और नागदा से आगे बढ़ सकती है कानूनी बहस –
कानूनी जानकारों का मानना है कि इस आदेश के बाद केवल नागदा और जावरा ही नहीं, बल्कि प्रदेश के अन्य नगरीय निकायों में भी ऐसे मामलों पर नई कानूनी रणनीति बन सकती है। विशेष रूप से वे मामले, जिनमें क्वो वारंटो की याचिकाएं केवल देरी के आधार पर निरस्त हुई थीं, अब दोबारा चर्चा में आ सकते हैं।
क्या अध्यक्षों की कुर्सी पर तत्काल असर पड़ेगा ? –
फिलहाल नहीं। जारी आदेश में हाईकोर्ट ने किसी भी अध्यक्ष को पद से हटाने या चुनाव को अवैध घोषित करने का अंतिम निर्णय नहीं दिया है। अदालत ने केवल यह कहा है कि याचिकाओं को देरी के आधार पर खारिज करना उचित नहीं था और अब उनकी सुनवाई मेरिट पर होगी।
आदेश की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी –
“यदि कोई व्यक्ति बिना अधिकार के सार्वजनिक पद पर बना हुआ है, तो उसके विरुद्ध क्वो वारंटो की याचिका केवल देरी के आधार पर खारिज नहीं की जा सकती।” यही टिप्पणी भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई में महत्वपूर्ण कानूनी आधार बन सकती है।
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