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Home»मध्यप्रदेश»रतलाम»कलेक्टर के ‘दरबार’ में जनप्रतिनिधि भी सिढिय़ों पर, क्या मंत्री-सांसद भी होंगे अगला शिकार ?
रतलाम

कलेक्टर के ‘दरबार’ में जनप्रतिनिधि भी सिढिय़ों पर, क्या मंत्री-सांसद भी होंगे अगला शिकार ?

EditorBy EditorApril 5, 2026No Comments
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– जिला पंचायत अध्यक्ष के बाद अब सीढिय़ों पर बैठे आलोट विधायक, सिस्टम पर उठे बड़े सवाल
– जनप्रतिनिधियों का अपमान, क्या तबादला सूचि में देखने मिलेगा कलेक्टर का नाम
जावरा / रतलाम। जिले में प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। भाजपा के आलोट विधायक डॉ. चिंतामण मालवीय को किसानों के साथ कलेक्टर कार्यालय की सीढिय़ों पर बैठकर इंतजार करना पड़ा। सड़क मुआवजे में बढ़ोतरी की मांग को लेकर पहुंचे विधायक को जब कलेक्टर मिशा सिंह से मिलने का समय नहीं मिला, तो नाराजगी खुलकर सामने आ गई।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ ‘इंतज़ार का दृश्य’ –
विधायक का सीढिय़ों पर बैठने यह दृश्य देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। लोगों ने इसे जनप्रतिनिधियों का अपमान बताते हुए प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाए। करीब आधे घंटे बाद कलेक्टर बाहर आईं और ज्ञापन लिया, लेकिन तब तक मामला तूल पकड़ चुका था।
क्या यह प्रशासनिक अनुशासन या अहंकार ? –
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज है कि कलेक्टर का रवैया आम जनता ही नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों के प्रति भी सख्त और दूरी भरा होता जा रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि जब विधायक को ही इस तरह इंतजार करना पड़े, तो आम नागरिकों की स्थिति क्या होगी ? दफ्तर पहुंचे लोगों और जनप्रतिनिधयों से की समस्या सुनने के लिए जब कलेक्टर के पास समय नहीं हैं तो ऐसे में कलेक्टर का गांवों में चौपाल लगाकर समस्याएं सुनना महज एक दिखावा ही लग रहा हैं।पहले भी कई जनप्रतिनिधि हो चुके हैं ‘नाराज़’ –
जनप्रतिनिधियो और प्रतिष्ठित लोगों को समय न देने का यह कोई पहला मामला नहीं है इससे पहले भी कई लोगों को कलेक्टर से मिलने के लिए धरना देना पड़ा हैं। हालही में करणी सेना प्रमुख जीवन सिंह भी आम जनता की मांगों को लेकर कलेक्टर से मिलना चाहते थे, लेकिन उनको न कलेक्ट्रेट पहुंचने दिया गया और ना ही धरना स्थल पर आकर कलेक्टर ने उनसे मुलाकात की, वहीं जिला पंचायत अध्यक्ष लालाबाई चंद्रवंशी और उनके पति को भी समय नहीं मिला था। और अब विधायक भी इसी सूची में शामिल हो गए। अब सियासी हलकों में चर्चा है—क्या अगला नंबर मंत्री और सांसद का है ?
अनुशासन या प्रशासनिक अहंकार-
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को जनता की आवाज़ माना जाता है, लेकिन यदि उन्हें ही कार्यालय की सीढिय़ों पर बैठना पड़े, तो यह व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। क्या यह अनुशासन है या फिर प्रशासनिक अहंकार का प्रदर्शन ?
कलेक्टर का पक्ष : समय तय था, विधायक अंदर नहीं आए –
विवाद बढऩे के बाद कलेक्टर मिशा सिंह ने सफाई दी कि विधायक से मिलने का समय तय था और संबंधित विभाग के अधिकारी भी मौजूद थे। उनके अनुसार विधायक ने अंदर आने के बजाय किसानों के सामने ही चर्चा करने की बात कही, इसलिए बाहर ही उनकी समस्या सुनी गई और समाधान का आश्वासन दिया गया।
तबादला या टकराव—अब क्या होगा अगला कदम ?
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह मामला यहीं शांत हो जाएगा या फिर आने वाली तबादला सूची में इसका असर दिखेगा। क्योंकि जिस तरह से सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों के साथ लगातार टकराव की स्थिति बन रही है, वह आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

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