– विधानसभा से लेकर पुलिस मुख्यालय तक उठे सवाल, हजारों लोग आज भी पैसे के इंतज़ार में
जावरा/भोपाल। मध्यप्रदेश में सहारा समूह में जमा पूंजी वापस पाने के लिए भटक रहे लाखों निवेशकों का मुद्दा अब फिर गरमा गया है। विधानसभा में पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह द्वारा उठाए गए सवाल के बाद सरकार के जवाब, पुलिस मुख्यालय के आदेश और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा विरोधाभास सामने आया है। आरोप है कि सरकार ने सदन में भ्रामक जानकारी दी, जबकि प्रदेश भर में सैकड़ों एफआईआर दर्ज होने के बावजूद कार्रवाई लगभग शून्य है।
विधानसभा में दिया गया जवाब विवादों में –
23 फरवरी को विधानसभा में सहारा पीडि़तों को लेकर सवाल पूछते हुए पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह ने सरकार से जानकारी मांगी कि सहारा समूह के खिलाफ प्रदेश में कितनी एफआईआर दर्ज हुई हैं। इस पर गृह राज्य मंत्री नरेन्द्र शिवाजी पटेल ने जवाब दिया कि सिर्फ 4 एफआईआर दर्ज हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग बताई जा रही है। जानकारी के अनुसार प्रदेश भर में लगभग 123 एफआईआर दर्ज हैं, जिनमें जावरा, रतलाम, मंदसौर, नीमच, उज्जैन, मुरैना सहित कई जिलों के मामले शामिल हैं। इसके बावजूद अब तक कोई बड़ी गिरफ्तारी नहीं, न संपत्ति कुकी और ना ही निवेशकों को सीधा भुगतान हुआ हैं। कांग्रेस नेता वीरेन्द्रसिंह सोलंकी ने स्वयं जावरा क्षेत्र में सहारा प्रबंधन के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई थी, फिर भी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाई।
एफआईआर खत्म करने के आदेश से और भड़का मामला –
विधानसभा में जवाब दिए जाने के अगले ही दिन 24 फरवरी को पुलिस मुख्यालय ने प्रदेशभर में दर्ज सहारा मामलों को निरस्त करने के निर्देश जारी कर दिए। कारण बताया गया कि सभी प्रकरण मुरैना न्यायालय में ट्रांसफर कर दिए गए हैं। इस मामले की जानकारी सहारा पीडि़तों की लंबे समय से लड़ाई लड रहे कांग्रेस नेता वीरेन्द्रसिंह सोलंकी ने सोशल मीडिया के माध्यम से गुरुवार को सुबह बताई। उन्होने अपने सोशल मीडिया हेंडल पर पुलिस मुख्यालय द्वारा जारी पत्र भी सबूत के तौर पर जारी किया हैं।
निवेशकों का सवाल है —
जब केस खत्म ही कर दिए जाएंगे तो हमें न्याय कहां से मिलेगा ? कई पीडि़त इसे कार्रवाई के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डालना बता रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी अधूरा रिफंड सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सहारा-सेबी (CRCS) रिफंड पोर्टल बनाया गया था ताकि निवेशकों को पैसा लौटाया जा सके।
आंकड़े चौंकाने वाले हैं —
सहारा सेबी पोर्टल पर कुल जमा राशि 24,980 करोड़ रुपए हैं। लेकिन अब तक इस पोर्टल पर कुल आवेदन 1 करोड़ 43 लाख 75 हजार 313 निवेशकों ने ऑनलाईन आवेदन किए हें। लेकिन इसके एवज में अब तक केवल 39 लाख 46 हजार 550 निवेशकों को भी आंशिक राशि का भुगतान हुआ हैं। जानकारी के मुताबिक 20 जनवरी 26 तक निवेशकों को कुल 8 हजार 429 करोड़ रुपए की ही राशि बांटी गई हैं। जबकि दावों के अनुसार निवेशकों की कुल मांग लगभग 97 हजार 412 करोड़ की है। यानी अब तक 10 प्रतिशत राशि भी वापस नहीं मिल पाई। और यह केवल सहारा समूह की 4 कंपनियों के मामले हैं, बाकी कंपनियों के लाखों निवेशक अभी भी प्रक्रिया से बाहर हैं।
पोर्टल पर आवेदन भी बना परेशानी –
जावरा, रतलाम और आसपास के क्षेत्रों में निवेशक महीनों से चक्कर लगा रहे हैं। निवेशकों को अपनी ही राशि पाने के लिए कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हैं। निवेशकों द्वारा जो ऑनलाईन आवेदन किए गए थे उनमें दस्तावेज त्रुटिपूर्ण बताकर आवेदन रिजेक्ट किए जा रहे हैं, बार-बार ओटीपी व आधार लिंकिंग की समस्या से जुझना पड़ रहा हैं। एजेंट गायब हैं, शाखा कार्यालय बंद हैं, वृद्ध निवेशक ऑनलाइन प्रक्रिया नहीं कर पा रहे हैं। कई बुजुर्ग निवेशकों ने बताया कि उन्होंने बेटी की शादी, इलाज और बुढ़ापे के सहारे के लिए पैसा जमा किया था, जो अब वर्षों से अटका है।
ग्रामीण इलाकों में सबसे ज्यादा असर –
मालवा-निमाड़ और चंबल क्षेत्र में सहारा की योजनाएं खासतौर पर ग्रामीण और मध्यमवर्गीय परिवारों में लोकप्रिय थीं। हजारों किसानों, मजदूरों, छोटे दुकानदारों और महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की जमा पूंजी फंसी हुई है।
एजेंट खूद बने पीडि़त –
कई गांवों में एजेंटों ने घर-घर जाकर निवेशकों ने दैनिक बचत योजना, सावधि जमा, मासिक आय योजना बताते हुए रुपए जमा करवाए थे। लेकिन अब एजेंट भी खुद पीडि़त बन गए हैं क्योंकि निवेशक उनसे ही पैसा मांग रहे हैं।
राशि नहीं मिलने से बढ़ता जनाक्रोश –
निवेशक संगठनों का आरोप हैं कि सरकार सदन में अलग जानकारी दे रही है, प्रशासन केस बंद कर रहा हैं और पोर्टल पर भुगतान बेहद धीमा हैं यानी निवेशक तीन स्तरों पर फंसे हैं कानून – प्रशासन – प्रक्रिया, ऐसे में अब जनाक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा हैं।
अब बड़ा सवाल यह –
यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश, एफआईआर और पोर्टल तीनों मौजूद हैं, तो फिर निवेशकों का पैसा आखिर अटका कहां है ? जब तक स्पष्ट कार्रवाई, संपत्ति जब्ती और तेज भुगतान प्रक्रिया शुरू नहीं होती, तब तक प्रदेश के लाखों सहारा पीडि़तों की उम्मीदें अधूरी ही रहेंगी — और यह मुद्दा आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन बन सकता है।
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