– मामला भैसाना की शासकीय जमीन पर अवैध कब्जे का
– लोकायुक्त तक पहुंचा मामला, फिर भी सरपंच बेखौफ !
जावरा। तहसील के राजस्व निरीक्षक वृत्त 01 ढोढर अंतर्गत ग्राम भैसाना स्थित सर्वे क्रमांक 260 की शासकीय भूमि पर वर्षों से चले आ रहे अतिक्रमण को आखिरकार प्रशासन ने बुधवार को हटाया। लंबी शिकायतों, जनसुनवाइयों और न्यायालय की शरण के बाद करीब एक साल से अधिक समय बीतने पर यह कार्रवाई हो सकी। मौके पर बने पक्के अवैध निर्माण को तोड़ा गया, जबकि टीन शेड व अन्य सामग्री हटाने के लिए अतिक्रमणकर्ताओं ने समय मांगा, जिस पर प्रशासन ने दो दिन में शासकीय भूमि खाली करने के सख्त निर्देश दिए।
रुपयों के दम पर कब्जा ? सरपंच-सचिव पर गंभीर आरोप –
उल्लेखनीय है कि ग्राम पंचायत भैसाना की इस शासकीय भूमि पर सरपंच पूजा पासी एवं सचिव प्रकाश चांवला पर रुपये लेकर छ: लोगों से अतिक्रमण करवाने के गंभीर आरोप लगे हैं। वहीं मामले में जावरा जनपद के सीईओ के नाम से भी रिश्वत मांगे जाने के ऑडियों वायरल हुए थे। जिसके बाद मामले को लेकर उपसरपंच सत्यनारायण पाटीदार व पंचों ने जावरा एसडीएम से लेकर कलेक्टर तक जनसुनवाई, सीएम हेल्पलाइन और यहां तक कि मुख्यमंत्री को भी लिखित शिकायतें भेजीं, लेकिन पूरे एक साल तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
धारा 40 की जगह लोकायुक्त, सवालों के घेरे में सिस्टम –
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जावरा जनपद सीईओ के प्रतिवेदन के बाद भी तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ श्रृंगार श्रीवास्तव ने सरपंच के विरुद्ध धारा 40 के तहत कार्रवाई करने के बजाय प्रकरण को लोकायुक्त भेज दिया, बताया जा रहा है कि यह निर्णय राजनीतिक दबाव में लिया गया। इससे आहत होकर उपसरपंच व पंचों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद प्रशासन हरकत में आया।
अंतिम बेदखली आदेश भी बेअसर रहा –
उल्लेखनीय है कि मामले में जावरा तहसीलदार द्वारा 11 अप्रैल 2025 को अतिक्रमण हटाने का अंतिम बेदखली आदेश जारी किया गया था, लेकिन इसके बावजूद महीनों तक न तो अतिक्रमण हटा और न ही जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई हुई। सवाल यह है कि जब आदेश जारी हो चुका था, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
लोकायुक्त में एफआईआर, फिर भी सरपंच कुर्सी पर कायम –
मामला लोकायुक्त तक पहुंचने के बाद सरपंच पर एफआईआर दर्ज हो चुकी है, जिसकी पुष्टि लोकायुक्त के जांच अधिकारी ने की है। एफआईआर दर्ज करने के आदेश जिला पंचायत सीईओ तक भी पहुंच चुके हैं, इसके बावजूद अब तक सरपंच के विरुद्ध कोई प्रशासनिक कार्रवाई नहीं होना, शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है। भैसाना का यह मामला अब केवल अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक निष्क्रियता, राजनीतिक दबाव और जवाबदेही की कमी का जीवंत उदाहरण बन चुका है।
बड़ा सवाल —
– क्या शासकीय जमीन पर कब्जा करने वालों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है?
– जब एफआईआर दर्ज हो चुकी है, तो सरपंच अब भी पद पर कैसे बनी हुई है?
– क्या कार्रवाई सिर्फ दिखावे तक सीमित है ?
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