– लोन के लिए भटक रहे उपभोक्ता, चहेतों को मिल रही सुविधा—आम आदमी के लिए योजना बनी छलावा
जावरा। जिस प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना को आम जनता के लिए राहत की किरण बताया गया था, वही अब बैंकों की मनमानी के चलते उपभोक्ताओं के लिए सिरदर्द बनती जा रही है। सोलर पैनल लगवाने के लिए बैंक से लोन का प्रावधान तो रखा गया, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सैकड़ों उपभोक्ता लोन के लिए दर-दर भटक रहे हैं। उपभोक्ताओं ने जिन-जिन बैंकों में लोन के लिए फाइलें लगा रखी हैं, वहां से उन्हें बार-बार चक्कर लगवाए जा रहे हैं। कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया जाता। कभी अधिकारी छुट्टी पर होने की बात कही जाती है, तो कभी फाइल अधूरी बताकर लौटा दिया जाता है। कई लोग तीन से चार महीने से बैंक के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन न लोन मिला और न ही कोई ठोस आश्वासन। कई परिवारों ने सोलर वेंडर से एग्रीमेंट तक कर लिया, लेकिन लोन न मिलने से काम अटक गया। जिसके चलते लोग न घर के रहे, न घाट के।
चहेतों पर मेहरबानी, आम जनता से बेईमानी –
सबसे गंभीर आरोप यह है कि बैंक अधिकारी अपने जान-पहचान और सिफारिश वाले लोगों को तो तुरंत लोन दे रहे हैं, लेकिन आम उपभोक्ताओं की फाइलों को जानबूझकर लटकाया जा रहा है। जिनके पास सिफारिश नहीं, उनके लिए नियम सख्त हो जाते हैं—और जिनके अपने हैं, उनके लिए सारे नियम ढीले। योजना का सपना था कि मध्यम वर्ग भी अपने घर की छत पर सोलर प्लांट लगाकर बिजली बिल से मुक्ति पाए, मगर बैंक शाखाओं में बैठे अधिकारी इस सपने पर पानी फेरते नजर आ रहे हैं। जिन उपभोक्ताओं ने विधिवत आवेदन दिए, सभी दस्तावेज जमा किए, उन्हें भी महीनों से सिर्फ आ जाइए-देखते हैं जैसे जवाब मिल रहे हैं।
बैंक बना रहे बहाने, उपभोक्ता परेशान –
उपभोक्ताओं का कहना है कि बैंक कर्मचारी योजना की जानकारी होने से ही इनकार कर देते हैं, कभी सिबिल का बहाना, कभी कोटा खत्म होने की बात, कई जगह फाइल आगे बढ़ाई ही नहीं जा रही, लोन स्वीकृति के नाम पर महीनों दौड़ाया जा रहा है, सिफारिश वालों के काम चुपचाप हो रहे हैं। कई परिवारों ने सोलर वेंडर से एग्रीमेंट तक कर लिया, लेकिन लोन न मिलने से काम अटक गया। लोग न घर के रहे, न घाट के। कुछ उपभोक्ताओं ने तो मजबूरी में योजना से ही हाथ खींच लिया।
मुफ्त बिजली का सपना, हकीकत में धक्के –
सरकार ने 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली और सब्सिडी का आकर्षक वादा किया, लेकिन बिना लोन के यह योजना आम आदमी की पहुंच से बाहर है। मध्यम वर्ग के लिए एकमुश्त 1.5 से 2 लाख रुपये लगाना आसान नहीं। ऐसे में बैंक ही सबसे बड़ी उम्मीद थे—और वही सबसे बड़ी रुकावट बन गए।
सवाल जो जवाब मांगते हैं –
क्या योजना सिर्फ रसूखदारों के लिए है ?
आम आदमी को ही क्यों चक्कर कटवाए जा रहे ?
क्या बैंक अधिकारी सरकार की मंशा को फेल कर रहे हैं ?
क्या इसकी निष्पक्ष जांच होगी ?
प्रशासन से दखल की मांग –
पीडि़त उपभोक्ताओं ने मांग की है कि बैंकों के लिए सख्त गाइडलाइन जारी हो, लोन स्वीकृति की समय-सीमा तय की जाए, पक्षपात करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो, आवेदनों की ऑनलाइन ट्रैकिंग हो। जब तक बैंक अपनी कार्यशैली नहीं सुधारेंगे, तब तक प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना आम जनता के लिए मुफ्त बिजली नहीं—सिर्फ छलावा बनकर रह जाएगी।
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