“मध्यप्रदेश में ‘घर-घर दारू’ की सरकार! 500 में शराब लाइसेंस, 5000 में शादी में जाम — जनस्वास्थ्य से खिलवाड़ या खजाना भरने की साज़िश?”
– मध्यप्रदेश को मद्य प्रदेश बनाने पर तुली।सरकार
भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार की नई आबकारी नीति ने प्रदेश की सामाजिक और नैतिक संरचना पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार अब महज़ 500 रुपये में घर-घर शराब परोसने का लाइसेंस और 5000 रुपये में शादी-समारोह में शराब परोसने की अनुमति देने जा रही है। यानी अब शराब न सिर्फ दुकानों तक सीमित रहेगी, बल्कि सीधे घरों और वैवाहिक कार्यक्रमों तक सरकारी मुहर के साथ पहुंचेगी।
आबकारी विभाग द्वारा जारी इस नई व्यवस्था के अनुसार कोई भी व्यक्ति अपने निजी घर, फार्म हाउस या विवाह स्थल पर शराब परोसने के लिए मामूली शुल्क देकर लाइसेंस ले सकेगा। इससे पहले तक ऐसे आयोजनों के लिए सख्त नियम और भारी शुल्क हुआ करता था, लेकिन अब सरकार ने इसे “सरल और सस्ता” बना दिया है।
शराब सस्ती – समाज महँगा ? –
इस नीति को लेकर समाजसेवियों, महिला संगठनों और जागरूक नागरिकों में तीव्र आक्रोश है। सवाल उठ रहे हैं की जब प्रदेश में घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाएँ, युवाओं की लत, परिवार टूटने की घटनाएँ
लगातार बढ़ रही हैं तो सरकार शराब को और सुलभ क्यों बना रही है ? क्या सरकार का मकसद राजस्व बढ़ाना है या समाज को नशे में डुबो देना ?
अब हर शादी बनेगी ‘दारू पार्टी’ ? –
5000 रुपये में शादी समारोह के लिए शराब लाइसेंस मिलने से अब विवाह, जो भारतीय संस्कृति में पवित्र संस्कार माना जाता है, खुलेआम शराबखोरी का अड्डा बन जाएगा। जहाँ पहले लोग चोरी-छिपे शराब परोसते थे, अब वह सरकारी अनुमति के साथ खुलेआम बहाई जाएगी।
जनता का सवाल – ये कैसी नीति ?
सरकार की इस नई आबकारी नीति पर आम जनता सरकार से पूछ रही है की क्या यही “सुशासन” है ? क्या यही “संस्कृति संरक्षण” है?
क्या मध्यप्रदेश को “मद्यप्रदेश” बनाने की तैयारी है ? –
सरकार जहाँ एक ओर नशा मुक्ति की बातें करती है, वहीं दूसरी ओर शराब को घर-घर पहुँचाने की योजना लागू कर रही है। यह दोहरा चरित्र नहीं तो क्या है ? नई आबकारी नीति ने यह साफ कर दिया है कि सरकार के लिए स्वास्थ्य, संस्कार और समाज से ज्यादा महत्वपूर्ण शराब से होने वाली कमाई है। अब देखना यह है कि जनता इस ‘दारू नीति’ को चुपचाप स्वीकार करेगी या सरकार को आईना दिखाएगी। 

