– जावरा की कई कॉलोनियां गंदगी में डूबीं, कॉलोनाइजर जमानत पर, जनता नरक में
जावरा। मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी तहसील के रुप में शामिल जावरा शहर जिसकी आबादी तकरीबन एक लाख के आसपास हैं। लेकिन इस शहर में ऐसी कई कॉलोनियां हैं, जहाँ कॉलोनाइजरों पर अवैध कॉलोनी काटने और विकास कार्य नहीं करने पर नगर पालिका ने जिला कलेक्टर के आदेश पर पुलिस के मार्फत एफआईआर दर्ज करवाई। लेकिन इन सभी कॉलोनाईजरों के मामले न्यायालय में लंबित हैं और वे सभी कॉलोनाईजर जमानत पर बाहर घूम रहे हैं, जबकि हजारों लोग गंदगी, बदबू और बीमारी में जीने को मजबूर हैं। इन सभी कॉलोनियों के कॉलोनाईजरों का पैटर्न एक जैसा है कॉलोनी काटो, प्लॉट बेचो, पैसा वसूलो और फिर कानून की आड़ लेकर भाग जाओ। क्या न्यायालय में मामला लंबित होना कानून तोडऩे का लाइसेंस बन गया है ?
कानून का डर खत्म, क्योंकि केस कोर्ट में है –
आज जावरा में यह खतरनाक सोच बन चुकी है कि मामला कोर्ट में है, कानूनी प्रक्रिया चल रही है, लेकिन इसका फायदा कॉलोनाइजर उठा रहे हैं कि अब कोई कुछ नहीं कर सकता। इसी का नतीजा है कि इन कॉलोनियों में न नालियां बनती हैं, न सड़कें, न ड्रेनेज और न ही सफाई और तो और पीने के पानी की भी व्यवस्था इन कॉलोनियों में कालोनाईजरों द्वारा नहीं की गई हैं। ऐसे में कॉलोनीवासी टेंकरों के भरोसे ही जीवन जी रहे हैं। इन कॉलोनियों में सिर्फ प्लॉट बिकते हैं, कॉलोनाईजर मोटी कमाई काटता हैं और जनता बीमारी खरीदती है।
केस कोर्ट में और कॉलोनी में अराजकता! –
क्या जमानत का मतलब यह है कि कॉलोनाइजर विकास नहीं करेंगे ? क्या कानून केवल एफआईआर तक सीमित है और उसके बाद आम जनता अपने हाल पर छोड़ दी जाती है ? ऐसे में शहर की कई कॉलोनियां आज गंदे पानी से लबालब हैं, मच्छरों का अड्डा बनी हुई हैं और संक्रमण का हॉटस्पॉट बन चुकी हैं। कॉलोनी को सड़े तालाब में बदल दिया गया हैं, इन सभी से निजात नहीं मिल रही हैं। क्यों कि कॉलोनाईजर जमानत पर हैं और विकास की छुट्टी हो चुकी हैं। क्या जमानत का मतलब जनता को सजा हैं ? क्या इसका अर्थ यह था कि कॉलोनाइजर विकास कार्य रोक दें ? लोगों को बीमारी और बदबू में जीने को मजबूर करें दें ? प्रशासन आंख मूंद ले ?
विधायक तैयार, लेकिन सिस्टम ठप –
जावरा विधायक डॉ राजेन्द्र पाण्डेय अपनी विधायक निधि और विशेष निधि से विकास कराने को तैयार हैं, लेकिन ऐसे कॉलोनाइजरों पर प्रशासनिक सख्ती न होने से सरकारी पैसा भी जमीन पर नहीं उतर पा रहा। ऐसे में विधायक तो विकास के लिए तैयार हैं लेकिन कॉलोनाइजर विकास में रोड़ा बने हुए हैं। अविकसित कॉलोनी काटकर मुनाफा कमाने वाले कॉलोनाइजरों के कारण सरकारी योजनाएं भी अटक रही हैं। सवाल यह है कि जब जनप्रतिनिधि तैयार हैं तो कॉलोनाइजरों की लापरवाही पर प्रशासन सख्ती क्यों नहीं कर रहा ?
न्यायालय से शहर की जनता की अपील, जमानत हो निरस्त –
अब सिर्फ एक कॉलोनी नहीं, पूरे जावरा की आवाज है कि सभी लंबित कॉलोनाइजर मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में लिया जाए, विकास कार्य नहीं करने वालों की जमानत निरस्त की जाए और उन्है पुन: सलाखों के पीछे डाला जाए और तब तक जमानत न दी जाए तब तक वे कॉलोनियो के अधुरे विकास काम पुरे ना कर दे। अधूरी कॉलोनियों को विकसित करवाने के लिए सख्त न्यायिक आदेश दिए जाएं, क्योंकि यह सिर्फ कॉलोनी का नहीं, जनस्वास्थ्य और मानवीय गरिमा का मामला है।
अब सवाल साफ है –
अगर केस न्यायालय में लंबित होना कॉलोनाइजरों के लिए ढाल बन गया है, तो फिर कानून किसके लिए है ? तो जनता को न्याय कब मिलेगा ? कॉलोनियों की हालत पूछ रही है कि क्या उन्है न्याय मिलेगा या केवल तारीखें ? जावरा की गंदी गलियां आज चीखकर पूछ रही हैं, कानून का डंडा इन जमानत पर रिहा कॉलोनाईजरों पर हमारे लिए कब चलेगा ? या कॉलोनीवासी यूही नारकीय जीवन जीते रहेंगे ?
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