– 2022-23 के चुनाव को 2026 में चुनौती, कोर्ट सख्त : लापरवाही का लाभ नहीं मिलेगा
– कोर्ट ने कहा तीन साल से अधिक का कार्यकाल बीत चुका हैं, अब हस्तक्षेप उचित नहीं
जावरा/इंदौर। मध्यप्रदेश की नगरीय राजनीति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में इंदौर हाईकोर्ट ने बड़ा और निर्णायक आदेश पारित किया है। जिसके बाद अब नोटिफिकेशन के अभाव में प्रदेश के सभी नगरीय निकायों के अध्यक्षों और उपाध्यक्षों पर लटकी तलवार की धार कम हो गई हैं। गजट नोटिफिकेशन के अभाव में पूर्व में याचिकाकर्ता रुमकण राजेश धाकड़ की याचिका पर हाईकोर्ट ने जावरा नगर पालिका अध्यक्ष अनम यूसुफ कड़पा के वित्तीय अधिकारों पर अंतरिम रोक लगा दी थी। जिसके बाद जावरा के साथ ही प्रदेश भर के नगरीय निकायों में हलचल पैदा हो गई थी। लेकिन इस मामले में अब न्यायालय ने ही पलटवार करते हुए याचिकाकर्ता रुमकण धाकड़ को दी गई अंतरिम राहत रद्द कर दी हैं। न्यायालय के इस आदेश के बाद अब नपाध्यक्ष के वित्तीय अधिकारों पर लगी रोक स्वत: समाप्त हो गई। यह फैसला न सिर्फ जावरा बल्कि पूरे प्रदेश की नगरीय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
याचिका में कहा गया कि 2022-23 में नगर पालिका चुनाव को चुनौती देना थी, लेकिन यह रुमकण धाकड़ ने यह याचिका साल 2026 में दायर की, यानी चुनाव के लगभग तीन साल बाद कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अमित राज तथा राज्य की ओर से एएजी राहुल सेठी व अन्य प्रतिवादियों की ओर से मधुसूदन द्विवेदी एवं रोहित कुमार मंगल ने कोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा कि नगर पालिका चुनाव 2022-23 में सम्पन्न हो चुके हैं। याचिका 2026 में दायर की गई, यानी अत्यधिक देरी की गई, याचिकाकर्ता ने अब तक इलेक्शन पिटीशन भी दायर नहीं की केवल दूसरे मामले डब्ल्यूपी 10957/2024 के आदेश का सहारा लेकर राहत मांगना कानूनी रूप से अनुचित है।
समय रहते उचित मंच का नहीं लिया सहारा –
गजट नोटिफिकेशन न होने के बावजूद याचिकाकर्ता को इलेक्शन पिटीशन दायर करने से रोका नहीं गया था, इसके बावजूद कोई प्रयास नहीं किया गया। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि समान परिस्थितियों वाले केस डब्ल्यूपी 10957/2024 में अंतरिम राहत दी गई थी। इसलिए इस मामले में भी राहत जारी रखी जानी चाहिए, लेकिन कोर्ट ने पूरे मामले का विश्लेषण करते हुए कहा याचिका दायर करने में अत्यधिक देरी और लापरवाही हुई हैं। याचिकाकर्ता ने समय रहते उचित मंच (इलेक्शन पिटीशन) का सहारा नहीं लिया, अब केवल दूसरे केस का लाभ लेने की कोशिश की जा रही हैं।
तीन साल का कार्यकाल बीत चुका, ऐसे में हस्तक्षेप उचित नहीं –
कोर्ट ने यह भी माना कि अध्यक्ष/उपाध्यक्ष का कार्यकाल पहले ही तीन साल से अधिक बीत चुका हैं, अब कार्यकाल समाप्ति के करीब हैं, ऐसे में इस स्तर पर हस्तक्षेप उचित नहीं हैं। कोर्ट ने शुक्रवार को स्पष्ट आदेश देते हुए प्रतिवादियों की आपत्ति स्वीकार की तथा याचिकाकर्ता रुमकण धाकड़ को दी गई अंतरिम राहत रद्द कर दिया। जिसके बाद अब न्यायालय द्वारा नपाध्यक्ष अनम कड़पा के वित्तिय अधिकारों पर लगाई रोक को हटा लिया गया हैं। इस फैसले के साथ ही अब जावरा नपा अध्यक्ष के वित्तीय अधिकार बहाल हो गए जिसके चलते रुके हुए प्रशासनिक कार्यों को फिर से गति मिलने का रास्ता साफ हुआ हैं।
बड़ा कानूनी संदेश –
इस फैसले से कोर्ट ने साफ संकेत दिया है न्याय के लिए समय पर आना जरूरी है, देरी करने वालों को राहत नहीं मिलेगी, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रिट पिटीशन का उपयोग केवल देरी छुपाने या दूसरे केस का फायदा उठाने के लिए नहीं किया जा सकता
प्रदेशभर में असर –
यह फैसला केवल एक नगर पालिका का मामला नहीं, मध्यप्रदेश में कई जगह चुनाव हो चुके हैं, गजट नोटिफिकेशन को लेकर विवाद हैं, ऐसे में यह आदेश पूरे प्रदेश के लिए एक मजबूत मिसाल बन सकता हैं। इंदौर हाईकोर्ट के इस फैसले ने दो अहम बाते साफ कर दी है जिसमें पहली देरी और लापरवाही पर अदालत सख्त है, वहीं दूसरी प्रशासनिक कामकाज को बिना ठोस कारण रोका नहीं जाएगा।
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