– त्योहारों में आम आदमी की जेब पर डाका, जिम्मेदार विभागों की खामोशी संदेह के घेरे में!
– जावरा से मंदसौर, नीमच, ताल और आलोट तक खाद्य तेल की री-पैकिंग के कारोबार पर गंभीर सवाल
– सरकारी आदेशों के बावजूद पुराने स्टॉक की बिक्री की शिकायतें
– खुले तेल का कारोबार भी बेखौफ जारी।
जावरा। महंगाई ने पहले ही आम आदमी की कमर तोड़ रखी है। दाल, आटा, सब्जी और गैस के बढ़ते दामों के बीच अब रसोई में इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेल को लेकर भी उपभोक्ताओं के साथ कथित लूट का खेल चलने की शिकायतें सामने आ रही हैं। बाजार में तेल पूरा बेचने का दावा, लेकिन पैकिंग में मात्रा कम होने के आरोप! ग्राहक कीमत पूरी चुका रहा है, लेकिन उसे बदले में निर्धारित मात्रा मिल रही है या नहीं, इसकी सुध लेने वाला कोई नजर नहीं आ रहा।
मध्यप्रदेश के रतलाम, जावरा, ताल, आलोट के साथ मंदसौर, नीमच जिलों और प्रदेश के कई अन्य जिलों तक खाद्य तेल की री-पैकिंग करने वाली कई कंपनियों और कारोबारियों का कारोबार सवालों के घेरे में है। बाजार में पैकिंग तेल की वास्तविक मात्रा को लेकर गंभीर शिकायतें हैं। यदि ये शिकायतें जांच में सही पाई जाती हैं तो यह सीधे तौर पर उपभोक्ताओं के साथ आर्थिक धोखाधड़ी का मामला होगा। सबसे हैरानी की बात यह है कि त्योहारी सीजन में जब खाद्य तेल की खपत सबसे ज्यादा है, तब भी संबंधित विभागों की सक्रियता जमीन पर दिखाई नहीं दे रही।
पैकेट पर मात्रा कुछ और, अंदर तेल कितना? ग्राहक को पता ही नहीं चल रही जेब कटने की कहानी ! –
आम आदमी बाजार से एक लीटर तेल खरीदता है। पैकेट पर लिखी कीमत चुकाता है और घर लौट जाता है। उसे क्या पता कि पैकेट में वास्तव में घोषित मात्रा है भी या नहीं ? यही इस पूरे खेल का सबसे गंभीर पहलू है। उपभोक्ता के पास न तो हर पैकेट की जांच करने का समय है और न ही सामान्य तौर पर उसे लीटर और किलोग्राम के अंतर की जानकारी होती है। इसी स्थिति का फायदा उठाकर यदि कोई कारोबारी निर्धारित मात्रा से कम तेल बेच रहा है तो यह केवल मुनाफाखोरी नहीं, बल्कि उपभोक्ता के अधिकारों पर सीधा हमला है।
400 ग्राम, 800 ग्राम और 13 किलो की पैकिंग पर प्रतिबंध आदेश, फिर बाजार में पुराने पैक कैसे ? –
केंद्र सरकार ने 6 जून 2026 को खाद्य तेल की पैकिंग के लिए नए मानक पैक साइज निर्धारित किए थे। इसके तहत तीन महीने का संक्रमणकाल दिया गया था। निर्धारित पैक साइज में 200, 500 मिली/ग्राम, 1, 2, 3, 4, 5, 15 और 20 लीटर/किलोग्राम शामिल हैं। ऐसे में खाद्य तेल की पैकिंग को लेकर सरकारी आदेशों और पुराने स्टॉक को समाप्त करने की समयसीमा के संबंध में भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कारोबारी सूत्रों के अनुसार 400 ग्राम, 800 ग्राम और 13 किलो की पैकिंग को लेकर प्रतिबंध संबंधी निर्देश जारी हुए थे। पुराने स्टॉक को निर्धारित समयसीमा में समाप्त करने की बात भी कही गई थी। दावों के मुताबिक थोक कारोबारियों के लिए 5 अक्टूबर और खुदरा विक्रेताओं के लिए 5 नवंबर तक स्टॉक समाप्त करने की समयसीमा थी। लेकिन बाजार में अब भी पुराने पैकिंग वाले तेल की उपलब्धता और बिक्री की शिकायतें सामने आ रही हैं। जबकि सूत्रों की माने तो यही रीपैकिंग कंपनिया बैक डेट के लेबल लगाकर नया तेल बाजार में कम वेट के साथ बेच रही हैं। जबकि सरकार ने जून के बाद से ही स्टेंडर्ड तय कर दिए हैं, बावजूद बाजार में अमानक वेट के साथ तेल का खेल बदस्तुर जारी हैं। “सरकारी प्रतिबंध और स्टॉक समाप्त करने की समयसीमा के बावजूद बाजार में पुरानी पैकिंग का तेल कैसे उपलब्ध? क्या विभाग ने जांच करना ही बंद कर दिया है?”

सवाल सीधा है यदि सरकार ने नियम बनाए हैं तो उनका पालन करवाएंगा कौन ? –
बाजार में चल रही इस तेल के वेट की लूट में अब सवाल सीधा सा हैं क्या नाप तोल विभाग ने री-पैकिंग कंपनियों के गोदामों की जांच की ? क्या थोक विक्रेताओं के स्टॉक का मिलान किया ? क्या खुदरा दुकानों पर जाकर प्रतिबंधित पैकिंग की जांच की ? यदि नहीं, तो आखिर विभाग किस कार्रवाई का इंतजार कर रहा है ? यदि सरकार ने ये नियम बनाए हैं तो इन नियमों का पालन आखिर कोन करवाएंगा ?
नापतौल विभाग की चुप्पी या कारोबारियों को खुली छूट ? –
नापतौल विभाग का काम ही यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ता को उतना ही सामान मिले, जितने का वह भुगतान कर रहा है। लेकिन यदि बाजार में कम मात्रा की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं और इसके बावजूद व्यापक जांच नहीं हो रही तो विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजिमी है। क्या अधिकारियों को बाजार में बिक रहे तेल की पैकिंग दिखाई नहीं देती ? क्या री-पैकिंग मशीनों की जांच नहीं होती ? क्या पैकिंग कंपनियों के कांटों और माप उपकरणों का सत्यापन नहीं किया जाता? क्या विभाग के पास बाजार निरीक्षण का कोई रिकॉर्ड नहीं है? और यदि रिकॉर्ड है तो उसमें कितनी अनियमितताएं पकड़ी गईं और कितने कारोबारियों पर कार्रवाई हुई ? क्या नापतौल विभाग केवल छोटे दुकानदारों की जांच करने के लिए है या बड़े री-पैकिंग कारोबारियों पर भी कानून लागू होता है ? विभागीय मिलीभगत का आरोप भी उठ रहा है, जिसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि किसी अधिकारी की भूमिका संदिग्ध मिलती है तो उसके विरुद्ध भी कार्रवाई होनी चाहिए।

छोट वेट घटा कर कमा रहे मोटा मुनाफा, हजारों ग्राहकों से रोजाना वसूली जा सकती है अतिरिक्त कीमत ! –
तेल के इस खेल में रीपैकिंग कंपनिया छोटा या वजन कम करके स्वयं मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। मान लीजिए किसी पैकेट में निर्धारित मात्रा से 50 ग्राम तेल कम निकलता है। एक ग्राहक को यह अंतर मामूली लग सकता है, लेकिन यदि रोजाना सैकड़ों या हजारों पैकेट बाजार में बिक रहे हों तो कुल कमी काफी बड़ी हो सकती है। यह गणना केवल उदाहरण है, वास्तविक नुकसान जानने के लिए बाजार की बिक्री और नमूना जांच जरूरी है। ऐसे में सवाल यह भी है कि यदि किसी कंपनी ने लंबे समय तक कम मात्रा वाले पैकेट बेचे हैं तो उससे प्रभावित उपभोक्ताओं को हुए नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
जिला प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल –
जावरा, मंदसौर, नीमच, ताल और आलोट के बाजारों में खाद्य तेल के कारोबार की व्यापक जांच की जरूरत है। जिला प्रशासन को अब केवल कागजी रिपोर्ट मंगाने के बजाय संयुक्त जांच दल बनाकर कार्रवाई करनी चाहिए। नापतौल विभाग, खाद्य सुरक्षा विभाग और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की संयुक्त टीम री-पैकिंग इकाइयों, गोदामों, थोक बाजारों और खुदरा दुकानों पर अचानक निरीक्षण करे। हर कंपनी के पैकेट का वजन, घोषित मात्रा, पैकिंग की तारीख, बैच नंबर और स्टॉक का मिलान हो। गड़बड़ी मिलने पर संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जाए। जांच में यदि अधिकारियों की लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है तो उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
अब जवाब देना होगा ! –
– खाद्य तेल की पैकिंग में कम मात्रा की शिकायतों पर अब तक कितनी जांच हुई ?
– पुराने पैकिंग स्टॉक की बिक्री की शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
– री-पैकिंग कंपनियों के गोदामों का अंतिम निरीक्षण कब किया गया?
– खुले तेल की बिक्री पर संबंधित विभाग क्या कार्रवाई कर रहे हैं?
– क्या नापतौल विभाग बड़े कारोबारियों की नियमित जांच करता है?
– यदि सब कुछ नियमानुसार है तो विभाग सार्वजनिक रूप से जांच रिपोर्ट जारी क्यों नहीं करता?
आम आदमी की जेब काटने वालों पर कार्रवाई कब ? –
त्योहारों पर लोग घरों में मिठाइयां बना रहे हैं, पकवान तैयार कर रहे हैं और परिवार की खुशियों के लिए बाजार से सामान खरीद रहे हैं। लेकिन यदि इसी मौके पर खाद्य तेल की पैकिंग में गड़बड़ी कर उपभोक्ताओं को नुकसान पहुंचाया जा रहा है तो इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा ? तेल की हर बूंद का पैसा वसूलने वाले कारोबारियों को यह समझना होगा कि उपभोक्ता की जेब उनकी निजी तिजोरी नहीं है। जिला प्रशासन को भी तय करना होगा कि कानून का राज चलेगा या कुछ कारोबारियों की मनमर्जी! अब वक्त आ गया है कि खाद्य तेल की री-पैकिंग के पूरे कारोबार की जांच हो, स्टॉक का हिसाब सार्वजनिक हो और गड़बड़ी करने वालों के साथ-साथ लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो। क्योंकि सवाल सिर्फ तेल में मिलावट या कम वजन का नहीं है, सवाल है आम आदमी के भरोसे और उसकी मेहनत की कमाई का!


