– कीमतों में बढ़ोतरी का आधार क्या है, और लागत घटने पर वस्तुओं के दाम क्यों नहीं होते कम ?
पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते ही वस्तुएं महंगी क्यों हो जाती हैं और कीमतें घटने पर सस्ती क्यों नहीं होतीं? मूल्य निर्धारण की पारदर्शिता और महंगाई पर विशेष लेख।
– सुश्री शैफाली मेडतवाल, विधि विद्यार्थी (जावरा)
आज देश में महंगाई एक गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल, खाद्य सामग्री, सब्जियां, दूध और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लगातार बढ़ते दाम आम नागरिक के जीवन पर सीधा प्रभाव डाल रहे हैं। सरकारें समय-समय पर महंगाई नियंत्रित करने के दावे करती हैं, लेकिन मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया आज भी आम जनता के लिए एक बड़ा प्रश्न बनी हुई है।
किस आधार पर होती हैं वृद्धि –
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि किसी एक वस्तु की कीमत में मात्र एक या दो रुपये की वृद्धि होती है, तो उससे जुड़ी अन्य वस्तुओं के दाम अचानक कई गुना अधिक क्यों बढ़ जाते हैं ? आखिर यह वृद्धि किस आधार पर तय की जाती है ? क्या इसके लिए कोई स्पष्ट आर्थिक या वैज्ञानिक मानक निर्धारित है, या फिर बाजार में कीमतें मनमाने तरीके से तय की जाती हैं ? उदाहरण के तौर पर जब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि होती है, तब परिवहन लागत बढऩे का हवाला देकर खाद्यान्न, सब्जियां, दूध, किराना सामग्री, निर्माण सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ा दिए जाते हैं। लेकिन जब पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी आती है, तब इन वस्तुओं के बढ़े हुए दाम वापस पहले स्तर पर क्यों नहीं आते ? यह प्रश्न वर्षों से आम जनता के मन में बना हुआ है।
मध्यम और निम्न वर्ग पर पड़ता हैं असर –
वर्तमान बाजार व्यवस्था में मूल्य निर्धारण की पारदर्शिता का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कई बार व्यापारी वर्ग केवल महंगाई बढ़ गई हैं का तर्क देकर कीमतें बढ़ा देता है, जबकि वास्तविक लागत में उतनी वृद्धि नहीं हुई होती। इसका सबसे अधिक असर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है, जिनकी आय सीमित होती है लेकिन खर्च लगातार बढ़ते जाते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी बनती है कि वे वस्तुओं के मूल्य निर्धारण के लिए स्पष्ट और पारदर्शी नीति तैयार करें। यदि उत्पादन लागत, परिवहन व्यय या करों में वास्तविक वृद्धि होती है, तभी उसी अनुपात में कीमत बढ़ाने की अनुमति दी जानी चाहिए। साथ ही लागत कम होने पर वस्तुओं की कीमतों में भी स्वाभाविक कमी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
निगरानी आयोग का हो गठन –
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लिए एक स्वतंत्र मूल्य निगरानी आयोग का गठन किया जा सकता है, जो बाजार में कीमतों की निगरानी करे तथा यह सुनिश्चित करे कि किसी भी वस्तु की कीमत बढ़ाने के पीछे ठोस और उचित कारण हो। नियमित निरीक्षण, प्रभावी नियंत्रण व्यवस्था और कठोर नियमों के माध्यम से बाजार में मनमानी पर अंकुश लगाया जा सकता है। महंगाई केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह समाज के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन, उसकी बचत, भविष्य की योजनाओं और जीवन स्तर से जुड़ा हुआ विषय है। जब आय स्थिर रहे और खर्च लगातार बढ़ते जाएं, तब परिवारों की आर्थिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव पडऩा स्वाभाविक है।
केवल महंगाई पर चर्चा ही काफी नहीं –
इसलिए आवश्यकता केवल महंगाई पर चर्चा करने की नहीं, बल्कि मूल्य निर्धारण की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी, जवाबदेह और न्यायसंगत बनाने की है। जब तक वस्तुओं की कीमत तय करने का स्पष्ट और संतुलित आधार विकसित नहीं किया जाएगा, तब तक महंगाई की समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं हो सकेगा।

