– SIR ने शुरु की त्रिकोणीय तलाश : बच्चे शिक्षक को ढूंढ रहे, शिक्षक मतदाताओं को और मतदाता अपनी पहचान ढूंढ रहे
– 25 से शुरु हो रही अद्र्धवार्षिक परीक्षाए, बच्चे अतिथियो के भरोसे
– कई स्कूलों में अतिथि ही नहीं, जो स्थायी शिक्षक उन्है भी जोद दिया एसआईआर में
– पटवारियों से लेकर नपा व अन्य अधिकारियों को भी लगा दिया मॉनटरिंग के काम में
जावरा। आगामी चुनावी तैयारियों का जनसुविधाओं पर कितना गहरा असर पड़ रहा है, इसका सबसे ताज़ा और कड़वा उदाहरण इन दिनों नगर के शासकीय स्कूलों, आंगनवाड़ी केन्द्रों और नगरीय निकायों में देखने को मिल रहा है। हालात यह हैं कि शिक्षक विद्यालयों से नदारत हैं, आंगनवाड़ी केन्द्र से कार्यकर्ता और नगरीय निकायों से अधिकारी व कर्मचारी नदारत हैं, पुछों कहां हैं ? तो जवाब मिलता हैं एसआईअर में व्यस्त हैं। स्कूलों में आगामी 25 से अद्र्धवार्षिक परीक्षाएं प्रारंभ होने वाली हैं, ऐसे में स्थायी शिक्षक स्कूलों से नदारत हैं तो पूरी शिक्षा व्यवस्था अतिथि शिक्षकों के भरोसे लटकी हुई है। जिन स्कूलों में एक या देा अतिथि शिक्षक हैं, वहां की सभी कक्षाएं अतिथियों के भरोसे हैं, ऐसे में स्कूल खोलने से लेकर उसे पुन: बंद करने तक सारी जिम्मेदारी अतिथियों पर ही आ गई हैं। नियमित स्कूलों में पढ़ाई लगभग ठप है, पर जिम्मेदार विभागों को इससे कोई सरोकार नहीं। कई स्कूलों में तो अतिथि शिक्षक भी पदस्थ नहीं हैं, ऐसे में उन स्कूलों के बच्चों का शिक्षण सत्र अंधकार में पहुंच गया हैं
शिक्षकों से लेकर विभागीय कर्मचारियों तक—सब SIR के चक्कर में –
सूत्रों के अनुसार, सिर्फ शिक्षक ही नहीं, कई विभागों के कर्मचारी व अधिकारी भी SIR में गुम हुए शिक्षक, स्कूलों और आंगनवाडिय़ों में बच्चों का भविष्य अधर मेंके चक्कर में दौड़ते नजऱ आ रहे हैं। एक तरफ ऑफिसों के ताले झूल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अधिकारी और कर्मचारी मतदाता सूची सुधार प्रक्रियाओं में व्यस्त हैं। आम जनता अपने कामों के लिए कार्यालयों और मतदाता सूची में नाम ढूंढने और कटने से बचाने के लिए बीएलओ के चक्कर लगाने को मजबूर है, पर सुनने वाला कोई नहीं। वहीं कई बड़े अधिकारियों के साथ पटवारियों और नपा के कर्मचारियों और महिला बाल विकास विभाग के अधिकारियों एसआईआर काम के सुपरविजन में लगा दिया गया हैं।
त्रिकोणीय तलाश शुरू—
एसआईआर के चलते इन दिनों त्रिकोणीय तलाश शुरु हो चुकी हैं। जिसमें बच्चे शिक्षक ढूंढ रहे, शिक्षक मतदाता को ढूढं रहे हैं और मतदाता 2003 की मतदाता सूची में अपनी व अपने परिवारजनों की पहचान को ढूंढते फिर रहे हैं। फिर भी न तो मतदाताओं को सूचि में अपने नाम मिल रहे हैं और ना स्कूलों को शिक्षक नसीब हो रहे हैं। कई लोगों का आरोप है कि मतदाता सूची में नाम जोडऩे के नाम पर भारी अव्यवस्था है—किसी का नाम गायब, किसी की उम्र गलत, किसी का परिवार कटा हुआ। जनता चुनाव आयोग की इस घोर लापरवाही और बगैर किसी पूर्व तैयारी के आम जनता पर एसआईआर लादने पर पर सवाल उठा रही है, पर समाधान कहीं दिखाई नहीं देता।
सवाल सीधा सा है … जिम्मेदारी किसकी ?
एसआईआर के चलते शिक्षा के साथ कई आवश्यक काम भी प्रभावित हो रहे हैं। नगरवासियों की मांग है कि प्रशासन चुनावी तैयारियों के साथ-साथ मूलभूत सेवाओं और शिक्षा व्यवस्था को भी प्राथमिकता में रखे। वरना इसका नुकसान सीधे बच्चों, जनता और लोकतंत्र—तीनों को होगा। शिक्षकों के अभाव में बच्चों के परीक्षा परिणामों पर असर होगा, नगरीय निकायों और अन्य विभागों के अधिकारी कर्मचारियों की अनुपस्थिति से कई अन्य महत्वपूर्ण काम भी प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में आखीर बड़ा सवाल यह उठ रहा हैं कि आखिर इसके पीछे जिम्मेदार कौन … ? चुनाव आयोग जो बगैर तैयार के एसआईआर लेकर बैठ गया हैं, या सरकार जो चुनाव से पहले अपने वोटर को साधने और वोटर लिस्ट में अपने अपने लोगों के नाम जुडवाने और विरोधियों के नाम काटने में लगी हैं ? या ऐसे अधिकारी, कर्मचारी जो एसआईआर के नाम पर अपने कर्तव्य से पल्ला झाड़ रहे हैं।
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