– सीएम हेल्पलाईन तक शिकायत की, मुख्यमंत्री, स्वास्थ मंत्री तक पहुचाई चिट्ठी , फिर भी नहीं आया कोई जवाब
जावरा। भाजपा सरकार में अधिकारियों द्वारा शासकीय कामो में लेट लतिफी की जा रही हैं, जिसके चलते लोगों को शासकीय कार्यालयों के चक्कर काटना पड़ रहे हैं, पीडि़त द्वारा सीएम हेल्पलाईन पर भी शिकायत दर्ज की, मुख्यमंत्री और स्वास्थ मंत्री को भी चि_ी भेजी लेकिन उसके बाद भी अब तक कोई जवाब नहीं आया हैं। जिसके चलते बीते सात माह से रतलाम से सेवानिव़त प्राध्यापक अपने चिकित्सा देयक बिलों की कार्योत्तर स्वीक़ति के लिए भटक रहे हैं। प्राध्यापक ने गत 16 अगस्त को क्षैत्रिय संचालक स्वास्थ सेवाएं उज्जैन के साथ ही मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और स्वास्थ मंत्री को पत्र भेजा था, जिसमें सात दिन में उत्तर देने की बात कहीं थी, लेकिन आधा माह बीतने आया, उसके बाद भी अब तक कहीं से भी कोई जवाब नहीं आया हैं। बीते एक माह से लगातार कार्रवाई हो रही हैं, समस्या समाचार पत्रों में भी प्रमुखता से प्रकाशित हो रही हैं, उसके बाद भी क्षैत्रिय संचालक कार्यालय उज्जैन के अधिकारियों व कर्मचारियों ने मौन धारण करके प्रकरण को ठंडे बस्ते में डाल रखा हैं।
सेवानिवृत प्राध्यायक का यह है मामला –
शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय रतलाम से सेवानिवृत प्राध्यापक डॉ मदनलाल गांगले (अर्थशास्त्र) द्वारा स्वयं के उपचार के दो चिकित्सा देयक बीलों जो मेरे सेवा काल के दौरान के ही हैं, क्षैत्रिय संचालक स्वास्थ सेवाएं उज्जैन को आपत्तियों का निराकरण करके भेजे गए और जमा करवाए गए हैं। लेकिन तकरीबन सात माह के बाद भी मेरे दो चिकित्सा देयक बीलों की कार्योत्तर स्वीकृति प्रदान नहीं की गई हैं। क्षैत्रिय संचालक स्वास्थ सेवाएं उज्जैन कार्यालय को स्पीड पोस्ट के माध्यम से दिनांक 6 फरवरी 24 को 23090 रुपए के मुल चिकित्सा देयक बीलों को प्रेषित किए गए थे। तत्पश्चात दिनांक 20 फरवरी 24 को क्षैत्रिय संचालक स्वास्थ सेवाएं उज्जैन को उपस्थित होकर कार्योत्तर स्वीकृती प्रमाण पत्र, रतलाम सिविल सर्जन सह मुख्य अस्पताल अधीक्षक द्वारा लंबी अवधि के उपचार का प्रमाण पत्र और मुल चिकित्सा देयक 38603 रुपए के बीलों को जमा कर रसीद प्राप्त की थी। सात माह का लंबा समय बीत जाने के बाद भी मेरे दो चिकित्सा देयक बीलों की कार्योत्तर स्वीकृति प्रदान नहीं की गई हैं। जिसके बाद के बाद 16 अगस्त 2024 को प्राध्यापक ने पुन: क्षैत्रिय संचालक को पत्र भेजकर कार्योत्तर स्वीकृति की मांग करते हुए सात दिन में पत्र का जवाब मांगा था, लेकिन अब तक ना तो कार्योत्तर स्वीकृति मिली और ना ही अब तक कोई जवाब ही आया हैं। ऐसे में अब सेवानिवृत प्राध्यापक को अपने ही राशि के बिलों के लिए दर दर भटकना पड़ रहा हैं। प्राध्यापक डॉ गांगले ने उनके दोनो चिकित्सा देयकों की कार्योत्तर स्वीकृति प्रदान की जाने की मांग की हैं, अन्यथा उच्च स्तरीय कार्रवाई करने की चेतावनी क्षैत्रिय संचालक को दी हैं।
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