– स्वामी राजेश्वरा नंद जी ने स्वयं को पहचानने पर दिया प्रेरक उद्बोधन
– अखिल भारतीय साहित्य परिषद ने आयोजित किया व्याख्यान
जावरा। शिशु जब जन्म लेता है तो वह सद्गुणों से देवीय गुणों से पूर्ण होता है बिलकुल निर्मल किंतु धीरे धीरे उस पर सांसारिक दुर्गुणों के आवरण चढऩे लगते है और वह दुर्गुणों का पुतला बन जाता है। तत्पश्चात फिर वह अपने दुर्गुणों के मैल को मिटाने में पूरा जीवन खपा देता है किंतु उनसे अंतिम सांस तक भी मुक्त नहीं होता।
यह बात स्वामी गुरु राजेश्वरानंदजी ने अखिल भारतीय साहित्य परिषद जावरा द्वारा स्वयं को पहचाने विषय पर आयोजित व्याख्यान के दौरान उपस्थित श्रोताओं से कहीं। इस दौरान स्वामीजी ने इस बात पर जोर दिया कि क्यों ना हम अपने को अपने अंदर बैठे परमात्मा को ही पहचाने जो की देवीय गुणों से सुसज्जित है। परमात्मा तो अनुभूत करने का विषय है उसे कहीं बाहर ढूंढने की आवश्यकता ही नहीं। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा ईश्वर अंश जीव अविनाशी। स्वामीजी ने अपने उद्बोधन में गुरु महिमा, गुरु की शक्ति का भी सोदाहरण जिक्र किया। उन्होंने कहा जब मनुष्य अपने पथ से भटक जाता है तो गुरु ही उसे सच्चा मार्ग दिखाता है। भीतर की यात्रा के उन्होंने दो ही मार्ग बताए एक जप दूसरा ध्यान और उदाहरण सहित दोनों की महत्ता प्रतिपादित की ।
मां शारदा के चित्र पर माल्यापर्ण के साथ हुआ शुभारंभ –
कार्यक्रम के शुभारंभ में मां शारदे के चित्र पर माल्यार्पण एवम दीप प्रज्वलन पूज्य स्वामीजी के साथ अतिथिद्वय डॉ आर. एन. मंडवारिया, समाजसेवी आनंदीलाल संघवी ने किया। डॉ ज्योति उपाध्याय एवं डॉ प्रकाश उपाध्याय ने सरस्वती वंदना स-स्वर प्रस्तुत की। अतिथि परिचय संरक्षक बाबूलाल नाहर ने दिया। व्याख्यान में शहर के कई प्रबुद्ध नागरिकों ने अपनी महनीय उपस्थिति से समारोह को गौरव प्रदान किया।


