– 5000 विद्यार्थियों वाले महाविद्यालय में कक्षों की कमी, प्राचार्य ने कलेक्टर को पहले ही लिखा था पत्र; फिर भी नहीं मिली कॉलेज को राहत
– भवन आवंटन से नाराज विद्यार्थियों ने एसडीएम कार्यालय पर दिया धरना
जावरा। एक तरफ नई शिक्षा नीति के तहत बढ़ते पाठ्यक्रम और दूसरी तरफ कक्षों की कमी से जूझता भगतसिंह शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय। विद्यार्थियों की पढ़ाई के लिए अतिरिक्त कमरों की जरूरत बताई जा रही है, लेकिन महाविद्यालय परिसर में स्थित सुभाष स्कूल के रिक्त भवन को महिला एवं बाल विकास विभाग के कार्यालय के लिए आवंटित किए जाने से विवाद खड़ा हो गया है। विवाद के चलते गुरुवार को महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने एसडीएम आफीस पर धरना दे दिया। विद्यार्थियों का सवाल सीधा है—जब कॉलेज को भवन की जरूरत थी और प्रबंधन ने इसके लिए पहले ही आवेदन दे रखा था, तो उसकी मांग पर निर्णय लेने से पहले शैक्षणिक जरूरतों को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई ?
5000 नियमित विद्यार्थी, 3000 स्वाध्यायी परीक्षार्थी; फिर भी कमरों का संकट ! –
भगतसिंह शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य ने 27 अक्टूबर 2026 को पत्र क्रमांक 1347/2026 के माध्यम से कलेक्टर रतलाम को रिक्त भवन महाविद्यालय को हस्तांतरित करने का अनुरोध किया है। पत्र में बताया गया है कि महाविद्यालय में लगभग 5000 विद्यार्थी नियमित अध्ययन कर रहे हैं, जबकि करीब 3000 स्वाध्यायी परीक्षार्थी भी परीक्षा देते हैं। नई शिक्षा नीति के तहत विभिन्न विषयों का अध्यापन कराया जा रहा है। स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर की कक्षाओं के संचालन के लिए कमरों की कमी बताई गई है। कॉलेज प्रशासन का कहना है कि इससे नियमित अध्यापन और परीक्षा संबंधी कार्यों में परेशानी हो रही है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि विद्यार्थियों की पढ़ाई के लिए जब अतिरिक्त कक्षों की जरूरत बताई जा रही है, तो परिसर के रिक्त भवन का उपयोग महाविद्यालय की जरूरतों को पूरा करने के लिए क्यों नहीं किया गया?
कॉलेज पहले से मांग रहा था भवन, फिर किस आधार पर हुआ आवंटन ? –
कॉलेज प्रशासन के अनुसार, सुभाष स्कूल के खाली होने के समय से ही भवन महाविद्यालय को हस्तांतरित करने के लिए आवेदन दिया गया था। इसके बावजूद भवन कॉलेज को नहीं मिला और अब महिला एवं बाल विकास विभाग को आवंटित किए जाने पर विद्यार्थियों ने विरोध का रास्ता अपनाया है। यहां सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक निर्णय की प्रक्रिया को लेकर है। क्या भवन आवंटित करने से पहले महाविद्यालय की जरूरतों का विस्तृत आकलन किया गया? क्या कॉलेज के पूर्व आवेदन पर विचार किया गया? यदि किया गया, तो उसकी मांग स्वीकार क्यों नहीं हुई? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।
विद्यार्थियों का धरना, एसडीएम का जवाब—कलेक्टर के आदेश पर हुआ आवंटन –
भवन को लेकर नाराज विद्यार्थियों ने एसडीएम कार्यालय पहुंचकर धरना दिया और ज्ञापन सौंपा। इस दौरान प्रभारी प्राचार्य मंजूला अलांसे भी मौजुद रही। विद्यार्थियों की मांग है कि परिसर का रिक्त भवन महाविद्यालय को दिया जाए, ताकि कक्षों की कमी दूर हो सके। वहीं एसडीएम केएस बघेल का कहना है कि भवन कलेक्टर के आदेश पर आवंटित किया गया है और कोई जबरन कब्जा नहीं किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि कॉलेज को भवन की आवश्यकता है तो वह अपनी रिपोर्ट के साथ पुन: प्रतिवेदन बनाकर भेजे। एसडीएम का यह बयान अब चर्चा के केंद्र में है। कॉलेज प्रशासन का कहना है कि वह भवन की मांग को लेकर पहले ही कलेक्टर को पत्र भेज चुका है। ऐसे में सवाल है कि जब मांग लिखित रूप में प्रशासन के सामने थी, तो अब फिर से प्रतिवेदन भेजने की बात क्यों कही जा रही है? क्या पहले दिए गए पत्र पर कोई निर्णय हुआ है? यदि हुआ है, तो उसका आधार सार्वजनिक होना चाहिए।
आदेश का हवाला अपनी जगह, विद्यार्थियों की पढ़ाई का सवाल अपनी जगह –
भवन का आवंटन कलेक्टर के आदेश से हुआ है, यह एसडीएम का पक्ष है। लेकिन किसी भी प्रशासनिक निर्णय के साथ यह सवाल भी जुड़ा रहता है कि उससे संबंधित संस्थानों की वास्तविक जरूरतों पर कितना विचार किया गया। महाविद्यालय में कमरों की कमी का दावा प्राचार्य के आधिकारिक पत्र में दर्ज है। ऐसे में मामला केवल एक भवन के आवंटन का नहीं, बल्कि शैक्षणिक संसाधनों के उपयोग और विद्यार्थियों की जरूरतों का भी है। महिला एवं बाल विकास विभाग को कार्यालय की जरूरत हो सकती है, लेकिन कॉलेज की शैक्षणिक जरूरतों का आकलन किए बिना विवाद का स्थायी समाधान निकलना मुश्किल है।
अब प्रशासन को देना होगा स्पष्ट जवाब –
जावरा के इस मामले में जिला प्रशासन के सामने तीन अहम सवाल हैं—
– कॉलेज द्वारा पहले दिए गए आवेदन पर क्या कार्रवाई हुई?
– भवन महिला एवं बाल विकास विभाग को आवंटित करने से पहले महाविद्यालय की कक्षों संबंधी जरूरतों का आकलन किया गया था या नहीं?
– क्या विद्यार्थियों की पढ़ाई को ध्यान में रखते हुए भवन आवंटन के फैसले पर पुनर्विचार किया जाएगा?
विद्यार्थियों का धरना और प्राचार्य का पत्र अब प्रशासन से स्पष्ट जवाब मांग रहे हैं। केवल आदेश का हवाला देना विवाद को समाप्त नहीं करेगा; जरूरी है कि कॉलेज की मांग पर हुई कार्रवाई और भवन आवंटन के आधार को सामने रखा जाए। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन विद्यार्थियों की शैक्षणिक जरूरतों को लेकर क्या कदम उठाता है।

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